“If I was not worthy of the Sufis' company, You should have made me fit for the gathering of revellers.”
अगर मैं सूफ़ियों की सोहबत के लायक़ नहीं था, तो मुझे मतवालों और आज़ाद-ख़याल रिंदों की महफ़िल के ही क़ाबिल बना दिया होता।
यहाँ शायर बड़े ही लाड़ और बेबाकी से खुदा से शिकवा कर रहा है कि वह ज़िंदगी के एक अजीब दोराहे पर फंसा हुआ है। उसका कहना है कि अगर मेरे मुकद्दर में सूफ़ियों जैसी पाकीज़गी और इबादत नहीं थी, तो मुझे पूरी तरह बेपरवाह और मस्त-मलंग रिंद ही बना दिया होता ताकि मैं कम से कम दुनिया की मदिरा-भरी महफ़िलों में सुकून पाता। यह शेर उस बेचैनी को छूता है जहाँ इंसान न पूरी तरह नेकी की राह चल पाता है और न सांसारिक मस्ती का आनंद ले पाता है, बल्कि दोनों के बीच अधूरा छूट जाता है।
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