ग़ज़ल
दहर में नक़्श-ए-वफ़ा वजह-ए-तसल्ली न हुआ
دہر میں نقشِ وفا وجہِ تسلی نہ ہوا
यह ग़ज़ल दुनिया में वफ़ा से मिली गहरी निराशा को दर्शाती है, जो कोई सांत्वना नहीं लाती। शायर महबूब की अत्यधिक क्रूरता के कारण होने वाली तीव्र पीड़ा व्यक्त करता है, यह कहते हुए कि मृत्यु भी वफ़ा के दुख से मुक्ति या महबूब को संतुष्टि नहीं दे पाती।
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1
दहर में नक़्श-ए-वफ़ा वजह-ए-तसल्ली न हुआ
है ये वो लफ़्ज़ कि शर्मिंदा-ए-मअ'नी न हुआ
इस दुनिया में वफ़ा (निष्ठा) का निशान कभी तसल्ली का कारण नहीं बना। यह वह शब्द है जिसका अर्थ कभी पूरा नहीं हुआ।
2
सब्ज़ा-ए-ख़त से तिरा काकुल-ए-सरकश न दबा
ये ज़मुर्रद भी हरीफ़-ए-दम-ए-अफ़ई न हुआ
आपके बेलगाम बाल चेहरे पर उगने वाले सब्ज़े (नए रोओं) से दब न सके। यह सब्ज़ा-ए-ख़त, जो ज़मुर्रद (पन्ना) जैसा है, साँप की ज़हरीली साँस का मुक़ाबला न कर सका।
3
मैं ने चाहा था कि अंदोह-ए-वफ़ा से छूटूँ
वो सितमगर मिरे मरने पे भी राज़ी न हुआ
मैंने चाहा था कि वफ़ा के दुख से छुटकारा पाऊँ। लेकिन वह ज़ालिम मेरे मरने पर भी राज़ी नहीं हुआ।
4
दिल गुज़रगाह-ए-ख़याल-ए-मय-ओ-साग़र ही सही
गर नफ़स जादा-ए-सर-मंज़िल-ए-तक़्वी न हुआ
भले ही दिल शराब और प्याले के विचारों का मार्ग बने, अगर साँस धार्मिकता की अंतिम मंज़िल का रास्ता नहीं बन पाई।
5
हूँ तिरे वा'दा न करने में भी राज़ी कि कभी
गोश मिन्नत-कश-ए-गुलबाँग-ए-तसल्ली न हुआ
मैं तुम्हारे वादा न करने में भी राज़ी हूँ, क्योंकि मेरा कान कभी दिलासे के मधुर गीत का इच्छुक नहीं हुआ।
6
किस से महरूमी-ए-क़िस्मत की शिकायत कीजे
हम ने चाहा था कि मर जाएँ सो वो भी न हुआ
मैं अपनी किस्मत की बदकिस्मती की शिकायत किससे करूँ? मैंने मरना चाहा था, पर वह भी न हो सका।
7
मर गया सदमा-ए-यक-जुम्बिश-ए-लब से 'ग़ालिब'
ना-तवानी से हरीफ़-ए-दम-ए-ईसी न हुआ
ग़ालिब होंठ की एक ज़रा-सी हरकत के सदमे से मर गया। वह इतना कमज़ोर था कि हज़रत ईसा की जीवन देने वाली साँस का भी सामना न कर सका।
8
न हुई हम से रक़म हैरत-ए-ख़त्त-ए-रुख़-ए-यार
सफ़्हा-ए-आइना जौलाँ-गह-ए-तूती न हुआ
मैं यार के चेहरे के ख़त की हैरत को लिख न सका। दर्पण का सफ़्हा (पृष्ठ) तोते के खेलने की जगह न बन सका।
9
वुसअत-ए-रहमत-ए-हक़ देख कि बख़्शा जावे
मुझ सा काफ़िर कि जो ममनून-ए-मआसी न हुआ
अल्लाह की रहमत की विशालता को देखो कि मुझ जैसे काफ़िर को भी बख़्श दिया जाए, जिसने अपने गुनाहों के लिए कभी शर्मिंदगी महसूस नहीं की।
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