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ग़ज़ल

हो गई है ग़ैर की शीरीं-बयानी कारगर

ہو گئی ہے غیر کی شیریں بیانی کارگر
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 8 shers· radif: नहीं

यह ग़ज़ल बेपनाह मुहब्बत के दर्द को दर्शाती है, जहाँ महबूब एक रक़ीब की मीठी बातों से बहक जाता है और सच्चे आशिक़ की ख़ामोश वफ़ादारी को नज़रअंदाज़ करता है। यह न पहचानी गई सच्चाई, अपनी क़ीमत न मिलने के एहसास और टूटी हुई ख़ुशियों से उपजे गहरे ग़म को ज़ाहिर करती है, जहाँ हर टूटा टुकड़ा और गहरा ज़ख्म बन जाता है।

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1
हो गई है ग़ैर की शीरीं-बयानी कारगर 'इश्क़ का उस को गुमाँ हम बे-ज़बानों पर नहीं
प्रतिद्वंद्वी की मीठी बातें असरदार साबित हुई हैं। उसे हम बेज़ुबान लोगों पर प्यार का कोई गुमान नहीं है।
2
ज़ब्त से मतलब ब-जुज़ वारस्तगी दीगर नहीं दामन-ए-तिमसाल आब-ए-आइना से तर नहीं
संयम का अर्थ वैराग्य के सिवा कुछ और नहीं है; प्रतिबिंब का दामन दर्पण के जल से गीला नहीं होता।
3
है वतन से बाहर अहल-ए-दिल की क़द्र-ओ-मंज़िलत 'उज़्लत-आबाद-ए-सदफ़ में क़ीमत-ए-गोहर नहीं
सज्जन लोगों या प्रतिभाशाली व्यक्तियों का सम्मान और स्थान उनके वतन से बाहर होता है। जिस तरह सीप के भीतर मोती का कोई मूल्य नहीं होता है।
4
बाइस-ए-ईज़ा है बरहम-ख़ुर्दन-ए-बज़्म-ए-सुरूर लख़्त लख़्त-ए-शीशा-ए-बशकस्ता जुज़ निश्तर नहीं
एक आनंदमयी सभा का भंग होना पीड़ा का कारण है; टूटे शीशे का हर टुकड़ा एक निश्तर के सिवा कुछ नहीं है।
5
वाँ सियाही मर्दुमुक है और याँ दाग़-ए-शराब मह हरीफ़-ए-नाज़िश-ए-हम-चश्मी-ए-साग़र नहीं
एक ओर आँख की पुतली की स्याही है और दूसरी ओर शराब के दाग़ वाला प्याला। चाँद, प्याले की आँख जैसी समानता के गर्व का मुक़ाबला नहीं कर सकता।
6
है फ़लक बाला-नशीन-ए-फ़ैज़-ए-ख़म गर दीदनी 'आजिज़ी से ज़ाहिरन रुत्बा कोई बरतर नहीं
यदि ऊँचाई पर स्थित आकाश भी विनम्रता से झुककर कृपा प्राप्त करता है, तो स्पष्ट रूप से विनम्रता से बढ़कर कोई पद नहीं है।
7
दिल को इज़्हार-ए-सुख़न अंदाज़-ए-फ़तह-उल-बाब है याँ सरीर-ए-ख़ामा ग़ैर-अज़-इस्तिकाक-ए-दर नहीं
दिल के लिए शब्दों का व्यक्त करना एक खुला दरवाज़ा खोलने जैसा है। यहाँ, कलम की सरसराहट उस दरवाज़े के खुलने की आवाज़ के अलावा कुछ नहीं है।
8
कब तलक फेरे 'असद' लब-हा-ए-तफ़्ता पर ज़बाँ ताक़त-ए-लब तिश्नगी साक़ी-ए-कौसर नहीं
असद, मैं कब तक अपने सूखे होठों पर जुबान फेरता रहूँगा? ऐ कौसर के साकी, मेरे होंठ अब इस प्यास को सह नहीं सकते।
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