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ग़ज़ल

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता

یہ نہ تھی ہماری قسمت کہ وصالِ یار ہوتا
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 11 shers· radif: होता

यह ग़ज़ल गहरे दुख और निराशा को व्यक्त करती है, जहाँ प्रेमी अपने महबूब से मिलन को अपनी क़िस्मत में नहीं पाता है। शायर कहता है कि अगर वह और जीता तो भी यह इंतज़ार ही रहता और महबूब के वादों पर कटाक्ष करता है कि अगर उनमें सच्चाई होती तो प्रेमी खुशी से मर जाता, न कि झूठी उम्मीद में जीता रहता। यह नियति, विरह और अधूरी मोहब्बत के दर्द को बयाँ करती है।

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1
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
यह हमारी किस्मत में नहीं था कि हमें अपने महबूब का मिलन नसीब होता। अगर हम और जीते रहते, तो यही इंतजार बना रहता।
2
तिरे वा'दे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए'तिबार होता
हम तुम्हारे वादे पर जिए, तो इसे झूठ समझना। क्योंकि अगर हमें सच में विश्वास होता, तो हम खुशी से मर चुके होते।
3
तिरी नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अहद बोदा कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तुवार होता
तुम्हारी कोमलता से मैं जान गया कि हमारा वादा कमज़ोर था। अगर वह मज़बूत होता तो तुम उसे कभी तोड़ नहीं सकती थी।
4
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
कोई मेरे दिल से तुम्हारे आधे खींचे हुए तीर के बारे में पूछे। अगर वह जिगर के आर-पार हो गया होता तो यह टीस कहाँ से होती?
5
ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता
यह कैसी दोस्ती है कि दोस्त उपदेशक बन गए हैं। कोई इलाज करने वाला होता, कोई दुःख बाँटने वाला होता।
6
रग-ए-संग से टपकता वो लहू कि फिर न थमता जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता
पत्थर की रगों से वह लहू टपकता जो फिर कभी न रुकता, जिसे तुम ग़म समझ रहे हो अगर वह चिंगारी होता।
7
ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता
दुःख भले ही जानलेवा हो, पर हम इससे कहाँ बचें क्योंकि हमारे पास एक दिल है। यदि प्रेम का दुख न होता, तो रोज़गार या दुनिया का दुख होता।
8
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता
मैं किससे कहूँ कि यह ग़म की रात कैसी बुरी बला है। मुझे मरने में क्या बुराई थी, यदि मृत्यु केवल एक बार आती?
9
हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता
जब हम मरने के बाद रुसवा हुए तो हम दरिया में क्यों न डूब गए? ऐसा होता तो न कभी जनाज़ा उठता और न कहीं मज़ार बनता।
10
उसे कौन देख सकता कि यगाना है वो यकता जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो-चार होता
उसे कौन देख सकता है, क्योंकि वह अत्यंत अद्वितीय और एक है। यदि उसमें द्वैत का ज़रा भी अंश होता, तो शायद वह कहीं दो-चार होता, यानी प्रकट होता या सामने आता।
11
ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान 'ग़ालिब' तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता
तसव्वुफ़ के ये पेचीदा मसले और तुम्हारी ये बयानबाज़ी, ग़ालिब! हम तुम्हें ज़रूर वली मानते, अगर तुम शराब पीने वाले न होते।
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