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ग़ज़ल

मीर-ए-सिपाह ना-सज़ा लश्करियाँ शिकस्ता सफ़

मीर-ए-सिपाह ना-सज़ा लश्करियाँ शिकस्ता सफ़

यह ग़ज़ल एक वियोग और निराशा के भाव को व्यक्त करती है, जिसमें जीवन की खोज और प्रेम की गहराई पर विचार किया गया है। शायर कहता है कि प्रेम में मरने का साहस, बिना सम्मान के जीने से कहीं बेहतर है।

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1
मीर-ए-सिपाह ना-सज़ा लश्करियाँ शिकस्ता सफ़ आह वो तीर-ए-नीम-कश जिस का न हो कोई हदफ़
मीर-ए-सिपाह, तुम्हारे द्वारा लूटी गई सेना की संपत्ति, अपमान के लायक नहीं है; आह, वह अर्ध-तने हुए धनुष का तीर, जिसका कोई लक्ष्य नहीं है।
2
तेरे मुहीत में कहीं गौहर-ए-ज़ि़ंदगी नहीं ढूँड चुका मैं मौज मौज देख चुका सदफ़ सदफ़
तुम्हारे आगोश में कहीं जीवन का मोती नहीं है, / मैं हर लहर और हर शंख को देखकर ढूंढ चुका हूँ।
3
इश्क़-ए-बुताँ से हाथ उठा अपनी ख़ुदी में डूब जा नक़्श ओ निगार-ए-दैर में ख़ून-ए-जिगर न कर तलफ़
इश्क़-ए-बुताँ (पहाड़ों के प्रेम) से हाथ उठा, अपनी ख़ुदी में डूब जा; नक़्श ओ निगार-ए-दैर में अपने दिल का खून मत बहा।
4
खोल के क्या बयाँ करूँ सिर्र-ए-मक़ाम-ए-मर्ग ओ इश्क़ इश्क़ है मर्ग-ए-बा-शरफ़ मर्ग हयात-ए-बे-शरफ़
खोलकर क्या बताऊँ मृत्यु और प्रेम के रहस्यमय ठिकाने को? प्रेम, स्वाभिमानी आत्मा की मृत्यु है और अपमानजनक जीवन की मृत्यु है।
5
सोहबत-ए-पीर-ए-रूम से मुझ पे हुआ ये राज़ फ़ाश लाख हकीम सर-ब-जेब एक कलीम सर-ब-कफ़
पीर-ए-रूम की संगत से मुझ पर यह रहस्य खुल गया; लाखों वैद्य सिर पर पैसे वाले, और एक सच्चा कलीम सिर पर हाथ वाले।
6
मिस्ल-ए-कलीम हो अगर मारका आज़मा कोई अब भी दरख़्त-ए-तूर से आती है बाँग-ए-ला-तख़फ़
यदि कोई कलीम की शक्ति का प्र험 करे, तो आज भी तूर पर्वत से 'ला-तक़फ़' की ध्वनि आती है।
7
ख़ीरा न कर सका मुझे जल्वा-ए-दानिश-ए-फ़रंग सुर्मा है मेरी आँख का ख़ाक-ए-मदीना-ओ-नजफ़
वह विदेशी ज्ञान की चमक सह नहीं पाया, मेरी आँखों में मदीना और नजफ़ की पवित्र धूल का काजल है।
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