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ग़ज़ल

आओ कभू तो पास हमारे भी नाज़ से

आओ कभू तो पास हमारे भी नाज़ से

यह ग़ज़ल एक भावपूर्ण और विरहपूर्ण प्रेम कविता है, जिसमें शायर अपने प्रियतम से मिलने और उसके साथ बिताए समय को संजोने की लालसा व्यक्त करता है। यह जीवन की अस्थिरता और प्रेम की गहराई पर विचार करती है, साथ ही एक मधुर और नज़दीकी संबंध की कामना करती है।

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1
आओ कभू तो पास हमारे भी नाज़ से करना सुलूक ख़ूब है अहल-ए-नियाज़ से
यदि तुम कभी हमारे पास आओ, तो हमारे नाज़ (सौंदर्य/कृपा) के साथ, सभी मनुष्यों के प्रिय व्यक्ति की तरह व्यवहार करना।
2
फिरते हो क्या दरख़्तों के साए में दूर दूर कर लो मुवाफ़क़त किसू बेबर्ग-ओ-साज़ से
क्या आप दूर-दूर तक पेड़ों की परछाईं में घूमते हैं, या किसी पत्तीहीन और बिना तार वाले कला के लिए सहमति देते हैं।
3
हिज्राँ में उस के ज़िंदगी करना भला न था कोताही जो न होवे ये उम्र-ए-दराज़ से
बिछड़कर उसके जीवन जीना अच्छा नहीं था, कहीं कि इस लंबे जीवनकाल में कोताही न हो जाए।
4
मानिंद-ए-सुब्हा उक़दे न दिल के कभू खुले जी अपना क्यूँ कि उचटे न रोज़े नमाज़ से
सुबह की सुंदरता के स्वामी, दिल के गांठ कभी नहीं खुलते, / जी अपना क्यों कि छोड़ते न रोज़े नमाज़ से।
5
करता है छेद छेद हमारा जिगर तमाम वो देखना तिरा मिज़ा-ए-नीम-बाज़ से
तुम्हारा मिजा-ए-नीम-बाज़ देखना हमारे पूरे जिगर में छेद कर देता है।
6
दिल पर हो इख़्तियार तो हरगिज़ न करिए इश्क़ परहेज़ करिए इस मरज़-ए-जाँ-गुदाज़ से
यदि हृदय पर नियंत्रण हो, तो कभी भी प्रेम न करें; इस जानलेवा, आत्मा को नष्ट करने वाले रोग से दूर रहें।
7
आगे बिछा के नता को लाते थे तेग़ ओ तश्त करते थे यानी ख़ून तो इक इम्तियाज़ से
आगे बिछाकर नता को लाते थे, तेग़ और तश्त से। वे ऐसा करते थे मानो ख़ून तो एक इम्तियाज़ से किया जा रहा हो।
8
माने हों क्यूँ कि गिर्या-ए-ख़ूनीं के इश्क़ में है रब्त-ए-ख़ास चश्म को इफ़शा-ए-राज़ से
माना क्यों कि खून से सनी हुई पहाड़ी के इश्क़ में, आँख की रहस्योद्घाटन से कोई खास रिश्ता है।
9
शायद शराब-ख़ाने में शब को रहे थे 'मीर' खेले था एक मुग़बचा मोहर-ए-नमाज़ से
शायद शराब-ख़ाने में रात को मिर्ज़ा ग़ालिब (या शायर) मौजूद थे, और वह नमाज़ की चादर से उठाए गए एक सिक्के के साथ कोई खेल खेल रहे थे।
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