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ग़ज़ल

छाती जला करे है सोज़-ए-दरूँ बला है

छाती जला करे है सोज़-ए-दरूँ बला है

यह ग़ज़ल दिल के अंदर जलने वाले असहनीय प्रेम के दर्द का वर्णन करती है। वक्ता कहता है कि यह पीड़ा एक ऐसी आग है जिसे समझा नहीं जा सकता, और प्रेम तथा वफ़ादारी के बीच का संघर्ष ही जीवन का मुख्य विषय है। यह कविता बताती है कि हर व्यक्ति की बेचैनी और दुःख का कोई कारण नहीं होता, बल्कि वह दिल और जान का एक अलग दर्द होता है।

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1
छाती जला करे है सोज़-ए-दरूँ बला है इक आग सी रहे है क्या जानिए कि क्या है
यह छाती में जलने वाला दुख एक भयानक पीड़ा है। यह एक आग जैसा है, और कोई नहीं जानता कि यह वास्तव में क्या है।
2
मैं और तू हैं दोनों मजबूर-ए-तौर अपने पेशा तिरा जफ़ा है शेवा मिरा वफ़ा है
मैं और आप दोनों अपने-अपने तरीके से मजबूर हैं; आपका काम बेवफ़ाई करना है, और मेरा काम वफ़ादारी निभाना है।
3
रू-ए-सुख़न है कीधर अहल-ए-जहाँ का या रब सब मुत्तफ़िक़ हैं इस पर हर एक का ख़ुदा है
हे रब, यह दुनिया के लोगों की प्रकृति है कि सभी इस बात पर सहमत हैं कि हर व्यक्ति का अपना ख़ुदा है।
4
कुछ बे-सबब नहीं है ख़ातिर मिरी परेशाँ दिल का अलम जुदा है ग़म जान का जुदा है
शायर कह रहा है कि मेरे लिए मेरी यह बेचैनी किसी बिना वजह की नहीं है। मेरा दिल का दर्द अलग है, और जान का गम उससे भी अलग है।
5
हुस्न उन भी मोइनों का था आप ही सूरतों में इस मर्तबे से आगे कोई चले तो क्या है
शायर कह रहा है कि उन महलों की सुंदरता आप ही के चेहरे में थी; इस स्तर से आगे कोई और कैसे मुकाबला कर सकता है।
6
शादी से ग़म-ए-जहाँ में वो चंद हम ने पाया है ईद एक दिन तो दस रोज़ याँ दहा है
शादी से दुनिया के गम में वह कुछ पल मिल गए; अगर ईद एक दिन का है, तो ये दस दिन जश्न हैं।
7
है ख़सम-जान-ए-आशिक़ वो महव-ए-नाज़ लेकिन हर लम्हा बे-अदाई ये भी तो इक अदा है
आशिक़ के जान से ये महव-ए-नाज़ तो है, पर हर पल की बे-अदाई भी एक अदा है।
8
हो जाए यास जिस में सो आशिक़ी है वर्ना हर रंज को शिफ़ा है हर दर्द को दवा है
जिस में बहुत सारी मुहब्बत का निराशा हो जाए, वरना हर ग़म का इलाज है और हर दर्द की दवाई है।
9
नायाब उस गुहर की क्या है तलाश आसाँ जी डूबता है उस का जो तह से आश्ना है
नायाब रत्न की तलाश क्या है जो आसान? वह तो उस व्यक्ति के लिए है जो उसकी गहराइयों से परिचित है, जो उसमें डूब जाता है।
10
मुशफ़िक़ मलाज़ ओ क़िबला काबा ख़ुदा पयम्बर जिस ख़त में शौक़ से मैं क्या क्या उसे लिखा है
मुशफ़िक़ मलाज़, ओ क़िबला काबा, ख़ुदा और पयम्बर, उस ख़त में शौक़ से मैं क्या-क्या उसे लिखा है।
11
तासीर-ए-इश्क़ देखो वो नामा वाँ पहुँच कर जूँ काग़ज़-ए-हवाई हर सू उड़ा फिरा है
प्रेम का असर देखो, वह नाम पहुँचकर हवा के कागज़ की तरह हर जगह उड़ फिरा है।
12
है गरचे तिफ़्ल-ए-मकतब वो शोख़ अभी तो लेकिन जिस से मिला है उस का उस्ताद हो मिला है
स्कूल का बच्चा भले ही शरारती हो, लेकिन जिस उस्ताद से वह मिला है, वह महान है।
13
फिरते हो 'मीर' साहब सब से जुदे जुदे तुम शायद कहीं तुम्हारा दिल इन दिनों लगा है
मीर साहब, आप हर किसी से अलग-अलग घूम रहे हैं, शायद इन दिनों आपका दिल कहीं और लग गया है।
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