ग़ज़ल
इश्क़ हमारे ख़याल पड़ा है ख़्वाब गई आराम गया
इश्क़ हमारे ख़याल पड़ा है ख़्वाब गई आराम गया
यह ग़ज़ल इश्क़ की तीव्र भावना और जीवन की अस्थिरता को दर्शाती है। कवि कहता है कि इश्क़ के कारण ख़याल, ख़्वाब और आराम सब खो गया है, जैसे सुबह या शाम का पता न चले। यह जीवन के क्षणभंगुर और अनिश्चित स्वरूप पर चिंतन करती है।
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1
इश्क़ हमारे ख़याल पड़ा है ख़्वाब गई आराम गया
जी का जाना ठहर रहा है सुब्ह गया या शाम गया
प्रेम मेरे मन में विचार बन गया है, एक सपना जो आराम को चला गया; आत्मा का जाना ठहर रहा है, चाहे वह सुबह हो या शाम।
2
इश्क़ किया सो दीन गया ईमान गया इस्लाम गया
दिल ने ऐसा काम किया कुछ जिस से मैं नाकाम गया
इश्क़ करने के कारण मेरा धर्म चला गया, मेरा ईमान चला गया, इस्लाम चला गया; / दिल ने ऐसा काम किया कि मैं असफल हो गया।
3
किस किस अपनी कल को रोवे हिज्राँ में बेकल उस का
ख़्वाब गई है ताब गई है चैन गया आराम गया
किस-किस के विरह में व्याकुल है वह जो दूर भटकता हुआ है। उसके सपने चले गए हैं, उसका उत्साह चला गया है, उसकी शांति चली गई है, और उसका आराम चला गया है।
4
आया याँ से जाना ही तो जी का छुपाना क्या हासिल
आज गया या कल जावेगा सुब्ह गया या शाम गया
आना या जाना, मन के रहस्य को छिपाना क्या फ़ायदा? आज गया या कल जाएगा; सुबह गई या शाम गई।
5
हाए जवानी क्या क्या कहिए शोर सरों में रखते थे
अब क्या है वो अहद गया वो मौसम वो हंगाम गया
हे जवानी, क्या क्या कहना है, जो सरों में शोर रखा था; अब वो अहद गया, वो मौसम गया, वो हंगामा भी गया।
6
गाली झिड़की ख़श्म-ओ-ख़ुशूनत ये तो सर-ए-दस्त अक्सर हैं
लुत्फ़ गया एहसान गया इनआ'म गया इकराम गया
यह गाली जैसी सुंदरता, यह आकर्षण, अक्सर केवल दिखावा होते हैं। नजाकत (लुत्फ़) चली गई, एहसान चला गया, इनआमत (उपहार) चला गया, और सम्मान (इकराम) भी चला गया।
7
लिखना कहना तर्क हुआ था आपस में तो मुद्दत से
अब जो क़रार किया है दिल से ख़त भी गया पैग़ाम गया
लिखना-कहना और तर्कों का आदान-प्रदान जो आपस में हुआ था, वह बहुत समय पहले की बात है; अब जो निर्णय दिल से लिया है, उससे न तो खत गया और न ही पैग़ाम गया।
8
नाला-ए-मीर सवाद में हम तक दोशीं शब से नहीं आया
शायद शहर से उस ज़ालिम के आशिक़ वो बदनाम गया
मीरे नाले में इस तरह का गुनाह हमने कई रातों से नहीं किया होगा; शायद उस ज़ालिम के आशिक़ को शहर से बदनाम होना पड़ गया।
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