“Behold, O Saqi, the wild tulip's radiant sway—a fire has swept down from the mountain into the wilderness.”
हे साक़ी, जंगली लाला (ट्यूलिप) का लहकना तो देखो, ऐसा लगता है मानो पहाड़ से वीराने की ओर आग फैल गई हो।
इस शेर में शायर बहार के पुरजोश मंज़र और ज़िंदगी की बेपनाह हरारत को बहुत ख़ूबसूरत अंदाज़ में बयां कर रहे हैं। वे साक़ी से कहते हैं कि पहाड़ों पर ख़ुद-ब-ख़ुद खिले सुर्ख़ लाला के फूलों को झूमते हुए देखो, उनका यह रंग ऐसा लग रहा है मानो पहाड़ों से आग की लपटें उतरकर पूरे वीराने में फैल गई हों। यह सिर्फ़ कुदरत का नज़ारा नहीं, बल्कि दिल में उमड़ते उस रूहानी जज़्बे और जुनून का प्रतीक है जो ख़ामोश ज़िंदगी में नया इंक़लाब और ताज़गी भर देता है।
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