ग़ज़ल
यूँ मैं सीधा गया वहशत में बयाबाँ की तरफ़
یوں میں سیدھا گیا وحشت میں بیاباں کی طرف
यह ग़ज़ल प्रेम की बेपनाह वहशत और गहरे आंतरिक दर्द को दर्शाती है, जहाँ व्याकुल प्रेमी बेबसी के आलम में वीराने की ओर भागता है। इसमें दिल में अचानक उठने वाले ग़म के तूफ़ान और बहते आँसुओं के ज़रिये विरह की चरम तड़प का मार्मिक चित्रण किया गया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
यूँ मैं सीधा गया वहशत में बयाबाँ की तरफ़
हाथ जिस तरह से आता है गरेबाँ की तरफ़
मैं दीवानगी की हालत में सीधे जंगल की ओर इस तरह चला गया, जैसे हाथ खुद-ब-खुद गरेबान की तरफ बढ़ता है।
2
बैठे बैठे दिल-ए-ग़म-गीं को ये क्या लहर आई
उठ के तूफ़ान चला दीदा-ए-गिर्यां की तरफ़
बैठे-बिठाए इस उदास दिल में अचानक यह कैसी तरंग उठी कि एक तूफ़ान उठकर रोती हुई आँखों की ओर चल पड़ा।
3
देखना लाला-ए-ख़ुद-रौ का लहकना साक़ी
कोह से दौड़ गई आग बयाबाँ की तरफ़
हे साक़ी, जंगली लाला (ट्यूलिप) का लहकना तो देखो, ऐसा लगता है मानो पहाड़ से वीराने की ओर आग फैल गई हो।
4
रो दिया देख के अक्सर मैं बहार-ए-शबनम
हँस दिया देख के अक्सर गुल-ए-ख़ंदाँ की तरफ़
ओस की बहार देखकर मैं अक्सर रो पड़ा, और खिलते हुए हँसते फूल की तरफ़ देखकर अक्सर हँस दिया।
5
बात छुपती नहीं पड़ती हैं निगाहें सब की
उस के दामन की तरफ़ मेरे गरेबाँ की तरफ़
बात छिप नहीं सकती क्योंकि सभी की नज़रें उसके दामन और मेरे फटे हुए गरेबान की तरफ़ उठती हैं।
6
सैकड़ों दाग़-ए-गुनह धो गए रहमत से तिरी
क्या घटा झूम के आई थी गुलिस्ताँ की तरफ़
आपकी रहमत से पापों के सैकड़ों दाग धुल गए, बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई बदरी झूमती हुई बाग़ की तरफ़ आई हो।
7
चश्म-ए-आईना परेशाँ-नज़री सीख गई
देखता था ये बहुत ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की तरफ़
आईने की आँख ने भटकी और बेचैन नज़र से देखना सीख लिया है, क्योंकि वह बहुत ज़्यादा बिखरी हुई ज़ुल्फ़ों की तरफ़ देखता रहा था।
8
सर झुकाए हुए है 'नज़्म' बसान-ए-ख़ामा
सम्त सज्दे की है तेरी ख़त-ए-फ़रमाँ की तरफ़
नज़्म एक क़लम की तरह अपना सिर झुकाए हुए है, और उसके सजदे का रुख़ आपके हुक्मनामे की ओर है।
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