ग़ज़ल
फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर
فارغ مجھے نہ جان کہ مانندِ صبح و مہر
यह ग़ज़ल प्रेम के दर्द की चिरस्थायी प्रकृति को दर्शाती है, जिसे शायर जीवन के बाद भी एक आभूषण की तरह संजोता है। अपने हृदय की उदासी और महबूब की निरंतर उदासीनता के बावजूद, वह अपने पुराने प्रेम-घावों में गर्व महसूस करता है। यह शेर वफ़ा की कमी और प्रेम में उसके प्रयासों की निष्फलता का विलाप करते हैं।
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1
फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर
है दाग़-ए-'इश्क़ ज़ीनत-ए-जेब-ए-कफ़न हुनूज़
मुझे फ़ारिग़ न जानो, क्योंकि सुबह और सूरज की तरह, प्रेम का दाग़ अभी भी मेरे कफ़न की जेब की शोभा है।
2
है नाज़-ए-मुफ़्लिसाँ ज़र-ए-अज़-दस्त-रफ़्ता पर
हूँ गुल-फ़रोश-ए-शोख़ी-ए-दाग़-ए-कोहन हुनूज़
गरीब लोग अपने खोए हुए धन पर गर्व करते हैं। मैं अभी भी अपने पुराने ज़ख्मों की चंचलता और आकर्षण को प्रस्तुत करता हूँ।
3
मै-ख़ाना-ए-जिगर में यहाँ ख़ाक भी नहीं
ख़म्याज़ा खींचे है बुत-ए-बे-दाद-फ़न हुनूज़
यहाँ हृदय रूपी मैख़ाने में अब धूल भी नहीं बची है। फिर भी, वह क्रूर और कलात्मक माशूक़ अभी भी अंगड़ाइयाँ ले रहा है।
4
बेगाना-ए-वफ़ा है हवा-ए-चमन हुनूज़
'वो' सब्ज़ा सँग पर न उगा कोहकन हुनूज़
चमन की हवा अभी भी वफ़ा से बेगानी है। वह सब्ज़ा अभी तक कोहकन के लिए पत्थर पर नहीं उगा है।
5
या-रब यह दर्द-मंद है कस की निगाह का
है रब्त-ए-मुश्क-ओ-दाग़-ए-स्वाद-ए-ख़ुतन हुनूज़
या-रब, यह दर्द-मंद किसकी निगाह का असर है? क्या कस्तूरी और खुतन के काले दाग़ का रिश्ता अभी भी कायम है?
6
जूँ जादा सर-ब-कू-ए-तमन्ना-ए-बे-दिली
ज़ंजीर-ए-पा है रिश्ता-ए-हुब्बुल-वतन हुनूज़
एक बंदी की तरह, निष्प्राण इच्छाओं की गली में सर झुकाए हुए, वतन से मोहब्बत का रिश्ता अभी भी पैरों की ज़ंजीर है।
7
मैं दूर गर्द-ए-क़ुर्ब-ए-बिसात-ए-निगाह था
बैरून-ए-दिल न थी तपिश-ए-अंजुमन हुनूज़
मैं दृष्टि के विशाल पटल पर निकटता का दूरस्थ कण था। अंजुमन का उत्साह अभी तक मेरे दिल से बाहर नहीं आया था।
8
मैं हूँ सराब-ए-यक-तपिश आमोख़्तन हुनूज़
ज़ख़्म-ए-जिगर है तिश्ना-ए-लब दोख़्तन हुनूज़
मैं एक ऐसी मृगतृष्णा हूँ जो एक ही तीव्र इच्छा से उत्पन्न हुई है और अभी भी सीख रही है। मेरे हृदय का घाव अभी भी उन होंठों का प्यासा है जो उसे सील दें।
9
ऐ शो'ला फ़ुर्सते कि सवैदा-ए-दिल से हूँ
किश्त-ए-सिपंद-ए-सद-जिगर अंदोख़्तन हुनूज़
हे ज्वाला, मुझे कहाँ की फुरसत, क्योंकि अपने दिल के गहरे काले स्थान से, मुझे अभी सौ जिगरों के अस्पंद की फसल इकट्ठी करनी है।
10
फ़ानूस-ए-शम्अ' है कफ़न-ए-कुश्तगान-ए-शौक़
दर-पर्दा है मु'आमला-ए-सोख़्तन हुनूज़
शौक़ के मारे हुए लोगों का कफ़न शम्अ' का फ़ानूस है। जलने का यह मामला अभी भी परदे में है।
11
मजनूँ फ़ुसून-ए-शो'ला-ख़िरामी फ़साना है
है शम' जादा दाग़-ए-नेफ़रोख़्तन हुनूज़
मजनूँ की आग जैसी चाल का जादू बस एक कहानी है। मोमबत्ती पर अभी भी न जले हुए हिस्से का निशान बाकी है।
12
कू यक शरर कि साज़-ए-चराग़ाँ करूँ 'असद'
बज़्म-ए-तरब है पर्दगए सोख़्तन हुनूज़
हे असद, एक चिंगारी कहाँ है जिससे मैं दीये रोशन करूँ? आनंद की महफ़िल तो अभी भी जले हुए परदे में लिपटी हुई है।
13
था मुझ को ख़ार-ख़ार-ए-जुनून-ए-वफ़ा 'असद'
सोज़न में था नहुफ़्ता गुल-ए-पैरहन हनूज़
असद, मुझे वफ़ा का काँटेदार जुनून था, जबकि उस वक़्त भी लिबास का फूल अभी तक सुई में ही छिपा हुआ था।
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