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ग़ज़ल

कमाल-ए-तर्क नहीं आब-ओ-गिल से महजूरी

कमाल-ए-तर्क नहीं आब-ओ-गिल से महजूरी

यह ग़ज़ल तर्क की महत्ता को नकारते हुए, प्रेम और वियोग (आब-ओ-गिल) में निहित भावनात्मक अनुभवों को अधिक महत्व देती है। शायर कहते हैं कि असली 'कमाल' तर्क में नहीं, बल्कि भावनात्मक गहराई में है, और सच्चा 'फ़क़्र' (निर्धनता) ही असली दौलत है।

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1
कमाल-ए-तर्क नहीं आब-ओ-गिल से महजूरी कमाल-ए-तर्क है तस्ख़ीर-ए-ख़ाकी ओ नूरी
तर्क का कमाल न तो पानी और बाग़ से बिछड़ना है, और न ही वह कमाल है जो धूल और नूर को जीतने से मिलता है।
2
मैं ऐसे फ़क़्र से ऐ अहल-ए-हल्क़ा बाज़ आया तुम्हारा फ़क़्र है बे-दौलती ओ रंजूरी
मैं ऐसे फ़क़्र से ऐ अहल-ए-हल्क़ा बाज़ आया, तुम्हारा फ़क़्र है बे-दौलती ओ रंजूरी।
3
न फ़क़्र के लिए मौज़ूँ न सल्तनत के लिए वो क़ौम जिस ने गँवाई मता-ए-तैमूरी
न यह (कविता) गरीबी के लिए है और न ही यह (कविता) किसी राज्य की शान के लिए, बल्कि वह क़ौम जिसने तैमूरियों का तेज खो दिया।
4
सुने न साक़ी-ए-महवश तो और भी अच्छा अयार-ए-गरमी-ए-सोहबत है हर्फ़-ए-माज़ूरी
अगर साक़ी-ए-महवश (प्यार का प्याला पिलाने वाला) महबूब की बातें न गाए, तो और भी अच्छा है, क्योंकि आशिक़ का मज़ा तो जुदाई के बस एक शब्द में है।
5
हकीम ओ आरिफ़ ओ सूफ़ी तमाम मस्त-ए-ज़ुहूर किसे ख़बर कि तजल्ली है ऐन-ए-मस्तूरी
हे वैद्य, हे ज्ञानी, हे सूफ़ी, सभी जो दिव्य उपस्थिति के मदहोश हैं, कौन जानता है कि यह प्रकटीकरण स्वयं मदहोशी का सार है।
6
वो मुल्तफ़ित हों तो कुंज-ए-क़फ़स भी आज़ादी न हों तो सेहन-ए-चमन भी मक़ाम-ए-मजबूरी
यदि वे दयालु हों, तो पिंजरे का कोना भी आज़ादी है; अन्यथा, बगीचे का मन भी मजबूरी की जगह है।
7
बुरा न मान ज़रा आज़मा के देख इसे फ़रंग दिल की ख़राबी ख़िरद की मामूरी
बुरा मत मानना, थोड़ा इसे आजमाकर देखना। विदेशी दिल की खराबी दुनिया के पैसे की गुलामी है।
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