Sukhan AI
ग़ज़ल

जब नाम तिरा लीजिए तब चश्म भर आवे

जब नाम तिरा लीजिए तब चश्म भर आवे

यह ग़ज़ल ईश्वर के नाम का स्मरण करने पर आँखों में आँसू आने और जीवन की कठिनाइयों के बीच भी एक अलौकिक शांति की भावना को दर्शाती है। यह बताती है कि जब मन ईश्वर के नाम में लीन होता है, तो जीवन के संघर्षों और मोह-माया के बंधनों से मुक्ति का भाव आ जाता है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
जब नाम तिरा लीजिए तब चश्म भर आवे इस ज़िंदगी करने को कहाँ से जिगर आवे
जब तेरा नाम लिया जाता है, तो आँखों में आंसू आ जाते हैं। इस जीवन को जीने के लिए मन कहाँ से आता है।
2
तलवार का भी मारा ख़ुदा रक्खे है ज़ालिम ये तो हो कोई गोर-ए-ग़रीबाँ में दर आवे
ज़ालिम ने तो तलवार के वार से भी ईश्वर को जीवित रखा है; जब कोई अजनबी की निगाह में दर आवेगा, तब ऐसा होगा।
3
मय-ख़ाना वो मंज़र है कि हर सुब्ह जहाँ शैख़ दीवार पे ख़ुर्शीद का मस्ती से सर आवे
वह मयखाना ऐसा नज़ारा है कि हर सुबह जहाँ शैख़ दीवार पर ख़ुर्शीद का मस्ती से सिर आते हैं।
4
क्या जानें वे मुर्ग़ान-ए-गिरफ़्तार-ए-चमन को जिन तक कि ब-सद-नाज़ नसीम-ए-सहर आवे
वे क्या जान सकते हैं उन बाग़ जैसे क़ैदियों का, जिन्हें सुबह की कोमल हवा छू नहीं पाती?
5
तू सुब्ह क़दम-रंजा करे टुक तो है वर्ना किस वास्ते आशिक़ की शब-ए-ग़म बसर आवे
यदि तुम्हारी निगाह सुबह में मेरे क़दमों को पीड़ा नहीं देती, तो आशिक़ को दुःख की रात कैसे गुजारनी?
6
हर सू सर-ए-तस्लीम रखे सैद-ए-हरम हैं वो सैद-फ़गन तेग़-ब-कफ़ ता किधर आवे
हर जगह सैद-ए-हरम को सर झुकाकर नमन करते हैं; वो सैद-फ़गन तेग़-ब-कफ़ हैं, कि उन्हें कहाँ खोजा जाए।
7
दीवारों से सर मारते फिरने का गया वक़्त अब तू ही मगर आप कभू दर से दर आवे
दीवारों से सिर मारकर भटकने का समय बीत गया है। अब, तू ही मगर आप कभी द्वार से दर आवे।
8
वाइ'ज़ नहीं कैफ़िय्यत-ए-मय-ख़ाना से आगाह यक जुरआ बदल वर्ना ये मिंदील धर आवे
वाइ'ज़ नहीं कैफ़िय्यत-ए-मय-ख़ाना से आगाह, यह जुरआ बदल वर्ना यह मिंदील धर आवे। (अर्थ: तुम्हें मय-ख़ाना के नशे की हालत से कोई जानकारी नहीं है, इसलिए एक बहादुर बदलाव करो, वरना यह रुमाल तुम्हारे सिर पर रख दिया जाएगा।)
9
सन्नाअ हैं सब ख़्वार अज़ाँ जुमला हूँ मैं भी है ऐब बड़ा उस में जिसे कुछ हुनर आवे
सब जगह खालीपन है, और मैं भी एक खालीपन हूँ। वह बड़ी कमी है जिसमें किसी हुनर का होना।
10
ऐ वो कि तू बैठा है सर-ए-राह पे ज़िन्हार कहियो जो कभू 'मीर' बला-कश इधर आवे
ऐ! तुम रास्ते के बीच में एक घातक आकर्षण की तरह बैठे हो। कहना कि कभी 'मीर' यहाँ कोई बला-कश (मोहक) चीज़ लेकर आएगा।
11
मत दश्त-ए-मोहब्बत में क़दम रख कि ख़िज़र को हर गाम पे इस रह में सफ़र से हज़र आवे
मोहब्बत के रेगिस्तान में कदम मत रखना, नहीं तो ख़िज़र हर कदम पर इस रास्ते में सफ़र से प्रकट हो जाएँगे।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.