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ग़ज़ल

અતિક્રમી તે ગઝલ

اتیکرمی سے غزل
अमृत घायल· Ghazal· 13 shers

यह ग़ज़ल किसी विशेष विषय पर केंद्रित न होकर, जीवन के विभिन्न पहलुओं और मानवीय भावनाओं के जटिल ताने-बाने को बुनती है। इसमें वक्ता ने जीवन के उतार-चढ़ावों और समय के निरंतर प्रवाह पर गहन चिंतन किया है, जो एक सार्वभौमिक अनुभव को व्यक्त करता है।

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2
લાજના ભાવથી નમી તે ગઝલ. જે પ્રથમ દૃષ્ટિએ ગમી તે ગઝલ.
लाज के भाव से झुकी वह ग़ज़ल। जो प्रथम दृष्टि में भायी वह ग़ज़ल।
यह ग़ज़ल वही है जो लज्जा के भाव से झुकी और वही ग़ज़ल है जो पहली दृष्टि में ही मन को भा गई।
4
શેરીએ શેરીમાં અજંપાની- આંધળી ભીંત થઈ ભમી તે ગઝલ.
गली-गली में बेचैनी की-अंधी दीवार बन घूमी वह ग़ज़ल।
यह ग़ज़ल हर गली में बेचैनी की अंधी दीवार बनकर घूमी। यह उद्देश्यहीन भटकती रही, बेचैनी के फैले हुए अहसास को अपने अंदर समेटे हुए।
6
તેજ રૂપે કદી તિમિર રૂપે, મેઘલી મીટથી ઝમી તે ગઝલ.
तेज रूपे कभी तिमिर रूपे,मेघली नज़र से झमी वो ग़ज़ल।
वह ग़ज़ल कभी प्रकाश तो कभी अंधकार के रूप में, एक धुंधली दृष्टि से झिलमिला उठी।
7
નિત સમય જેમ ઊગતી જ રહી, અસ્તમાં પણ ન આથમી તે ગઝલ.
नित समय जैसे उगती ही रही, अस्त में भी न अस्त हुई वो ग़ज़ल।
वह ग़ज़ल निरंतर सूर्योदय की तरह उगती रही और अस्त होने पर भी कभी नहीं डूबी।
8
દૃષ્ટિ મળતાં જ પાંપણો મધ્યે, ઊગે સંબંધ રેશમી તે ગઝલ.
दृष्टि मिलते ही पलकों के मध्य,उगे संबंध रेशमी वह ग़ज़ल।
जब पलकों के बीच नज़रें मिलती हैं, एक रेशमी संबंध पनपता है। यही कोमल बंधन वह ग़ज़ल है।
10
એ તો છે ચીજ સર્વ મોસમની, નિત્ય લાગે જે મોસમી તે ગઝલ.
यह तो है चीज़ हर मौसम की,नित्य लगे जो मौसमी, वह ग़ज़ल।
ग़ज़ल एक ऐसी रचना है जो हर मौसम से संबंधित है, फिर भी वह हमेशा वर्तमान और ताज़ा महसूस होती है, मानो हमेशा मौसम में हो।
13
લીટી એકાદ નીરખી ‘ઘાયલ’, હલબલી જાય આદમી તે ગઝલ.
एक आध पंक्ति देख कर 'घायल',हलचल हो जाए आदमी को वह गज़ल।
घायल की एक-आध पंक्ति देखकर ही, मनुष्य उस गज़ल से प्रभावित हो जाता है।
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