ग़ज़ल
नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का
نقش فریادی ہے کس کی شوخیِ تحریر کا
यह ग़ज़ल जीवन के गहरे और अक्सर दर्दनाक पहलुओं को दर्शाती है, जहाँ हर तस्वीर एक शिकायत की तरह है। यह अकेलेपन और कठिन जीवन के संघर्ष के साथ-साथ बेकाबू जुनून की शक्ति को भी उजागर करती है। ग़ालिब कहते हैं कि उनके काव्य का वास्तविक अर्थ, पौराणिक अन्क़ा की तरह, सामान्य समझ से परे और मायावी है।
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1
नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का
काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का
यह चित्र किसकी चंचल रचना की शिकायत कर रहा है, क्योंकि हर चित्रित आकृति का वस्त्र कागज़ का बना हुआ है।
2
काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई न पूछ
सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का
अकेलेपन में जीवन की कठिन सहने की पीड़ा न पूछो। शाम को सुबह करना, यानी रात बिताना, दूध की नदी लाने जितना मुश्किल है।
3
जज़्बा-ए-बे-इख़्तियार-ए-शौक़ देखा चाहिए
सीना-ए-शमशीर से बाहर है दम शमशीर का
इस बेकाबू शौक़ के जज़्बे को देखना चाहिए; तलवार का दम उसकी म्यान के सीने से बाहर है।
4
आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए
मुद्दआ अन्क़ा है अपने आलम-ए-तक़रीर का
जागरूकता सुनने का जाल जितना चाहे उतना फैलाए, मेरे भाषण का असली उद्देश्य अन्क़ा पक्षी की तरह दुर्लभ और अगम्य है।
5
बस-कि हूँ 'ग़ालिब' असीरी में भी आतिश ज़ेर-ए-पा
मू-ए-आतिश दीदा है हल्क़ा मिरी ज़ंजीर का
चूँकि मैं ग़ालिब हूँ, इसलिए क़ैद में भी मेरे पैरों के नीचे आग है। मेरी ज़ंजीर के कड़े आग से झुलसे हुए बालों जैसे हैं।
6
आतिशीं-पा हूँ गुदाज़-ए-वहशत-ए-ज़िन्दाँ न पूछ
मू-ए-आतिश दीदा है हर हल्क़ा याँ ज़ंजीर का
मैं आग जैसे पैरों वाला हूँ, इसलिए कारावास की दहशत कैसे पिघल जाती है, यह न पूछो। यहाँ ज़ंजीर का हर कुंडा आग से देखे हुए बाल के समान है।
7
शोख़ी-ए-नैरंग सैद-ए-वहशत-ए-ताऊस है
दाम-ए-सब्ज़ा में है परवाज़-ए-चमन तस्ख़ीर का
भ्रम की चंचलता मोर की जंगली प्रकृति का शिकार है। बाग की उड़ान उसकी अपनी हरियाली के जाल में फँसी हुई है, जो उसे वश में करने के लिए है।
8
लज़्ज़त-ए-ईजाद-ए-नाज़ अफ़सून-ए-अर्ज़-ज़ौक़-ए-क़त्ल
ना'ल आतिश में है तेग़-ए-यार से नख़चीर का
प्रिय के नए-नए नाज़ गढ़ने का आनंद 'वध' के रोमांच के स्वाद को दर्शाने वाला एक आकर्षण है। प्रिय की तलवार से शिकार का खुर आग में है, जो उसकी तीव्र इच्छा को दर्शाता है।
9
ख़िश्त पुश्त-ए-दस्त-ए-इज्ज़ ओ क़ालिब आग़ोश-ए-विदा'अ
पुर हुआ है सैल से पैमाना किस ता'मीर का
ईंटें बेबसी की मारी पड़ी हैं और साँचे विदाई की आगोश में हैं। किस निर्माण का पैमाना इस बाढ़ से भर गया है?
10
वहशत-ए-ख़्वाब-ए-अदम शोर-ए-तमाशा है 'असद'
जो मज़ा जौहर नहीं आईना-ए-ताबीर का
असद, अभाव के स्वप्न का भय एक शोरगुल भरा तमाशा है; इसकी शोभा व्याख्या के दर्पण का वास्तविक सार नहीं है।
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