ग़ज़ल
दामन वसीअ' था तो काहे को चश्म तरसा
दामन वसीअ' था तो काहे को चश्म तरसा
यह ग़ज़ल ईश्वर की असीम कृपा और दया की बात करती है, जो हर स्थिति में उपलब्ध है। कवि कहता है कि यदि दामन (घेरा) ही विशाल था, तो फिर उसे प्यास बुझाने के लिए चश्मे (पानी) की क्या ज़रूरत थी। यह जीवन में व्याप्त दैवीय कृपा के महत्व पर ज़ोर देती है।
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1
दामन वसीअ' था तो काहे को चश्म तरसा
रहमत ख़ुदा की तुझ को ऐ अब्र ज़ोर बरसा
दामन वसीअ' था तो काहे को चश्म तरसा। रहमत ख़ुदा की तुझ को ऐ अब्र ज़ोर बरसा।
अर्थ: अगर तेरा दामन (किनारा/पल्लू) ही विशाल था, तो तू चश्म (पानी का बर्तन) के लिए क्यों तरसे। ऐ बादल, तुझ पर ख़ुदा की रहमत ज़ोर से बरसा।
भाव: यह उपमा करता है कि अगर तेरे पास पर्याप्त संसाधन (दामन वसीअ') हैं, तो बाहरी सहारे (चश्म) के लिए तरसने की क्या ज़रूरत है। अतः, ऐ बादल, तुझ पर ख़ुदा की कृपा ज़ोर से बरसे।
2
शायद कबाब कर कर खाया कबूतर उन ने
नामा उड़ा फिरे है उस की गली में पर सा
शायद कबूतरों ने कबाब खाए, और उस गली में उनका नाम फैला दिया, पर कोई बात नहीं, मेरे प्यारे।
3
वहशी मिज़ाज अज़-बस मानूस बादया हैं
उन के जुनूँ में जंगल अपना हुआ है घर सा
यह जंगली मिज़ाज केवल एक इंसान की रचना है, पर उनके जुनून में जंगल का अपना घर जैसा होना है।
4
जिस हाथ में रहा की उस की कमर हमेशा
उस हाथ मारने का सर पर बँधा है कर सा
जिस हाथ में वह रही, उस की कमर हमेशा/उस हाथ मारने का सर पर बँधा है कर सा।
अर्थात्, जिस भी व्यक्ति के आगोश में वह स्त्री रही, उसकी कमर हमेशा उस हाथ के मारने जैसा भय या बंधन महसूस करती है।
5
सब पेच की ये बातें हैं शा'इरों की वर्ना
बारीक और नाज़ुक मू कब है उस कमर सा
ये सब शायरों की बातें हैं, वर्ना कमर इतनी नाज़ुक और पेचीदा नहीं होती।
6
तर्ज़-ए-निगाह उस की दिल ले गई सभों के
क्या मोमिन ओ बरहमन क्या गब्र और तरसा
उसकी नज़रों का अंदाज़ सबके दिल चुरा गया, चाहे वह मोमिन हो, ब्राह्मण हो, गब्र हो या तरसा।
7
तुम वाकि़फ़-ए-तरीक़-ए-बेताक़ती नहीं हो
याँ राह-ए-दो-क़दम है अब दूर का सफ़र सा
तुम वाकिफ़ नहीं हो कि यह रास्ता निरंतर प्रयास का है, यह राह तो अब दो क़दम दूर के सफ़र जैसी है।
8
कुछ भी म'आश है ये की उन ने एक चश्मक
जब मुद्दतों हमारा जी देखने को तरसा
यह क्या बात है कि उन्होंने बस एक नज़र डाली, जब बहुत समय से हमारा दिल देखने के लिए तड़प रहा था।
9
टुक तर्क-ए-'इश्क़ करिए लाग़र बहुत हुए हम
आधा नहीं रहा है अब जिस्म-ए-रंज-फ़र्सा
ऐसी प्रेम की तर्क-बातें करने से हम बहुत तंग हो गए हैं; मेरा दुःख से भरा शरीर अब आधा भी नहीं सह सकता।
10
वा'इज़ को ये जलन है शायद कि फ़रबही से
रहता है हौज़ ही में अक्सर पड़ा मगर सा
शायद वा'इज़ को जलन है कि फ़रबही से, जो अक्सर हौज़ में पड़ा रहता है, लेकिन किसी अलग ढंग से।
11
अंदाज़ से है पैदा सब कुछ ख़बर है उस को
गो 'मीर' बे-सर-ओ-पा ज़ाहिर है बे-ख़बर सा
हर चीज़ अंदाज़ से पैदा होती है, वह सब कुछ जानता है। गो 'मीर' का अंदाज़ बिना सिर-ओ-पा (शरीर) पर भी स्पष्ट है, भले ही वह बेखबर लगे।
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