ग़ज़ल

रंग-ए-शराब से मिरी निय्यत बदल गई

رنگ شراب سے مری نیت بدل گئی
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 6 shers· radif: गई

यह ग़ज़ल मानवीय चंचलता और हुस्न के सम्मोहन को बड़े ही रोचक और विनोदपूर्ण अंदाज़ में प्रस्तुत करती है। इसमें उपदेशक की नसीहतों पर साक़ी की कशिश और महबूब के हुस्न की जीत को रेखांकित करते हुए संयम और आकर्षण के द्वंद्व को दर्शाया गया है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
रंग-ए-शराब से मिरी निय्यत बदल गई वाइज़ की बात रह गई साक़ी की चल गई
शराब का रंग देखकर मेरी नीयत बदल गई; उपदेशक की सीख धरी की धरी रह गई और साक़ी की बात चल निकली।
2
तय्यार थे नमाज़ पे हम सुन के ज़िक्र-ए-हूर जल्वा बुतों का देख के निय्यत बदल गई
जन्नत की हूरों का ज़िक्र सुनकर हम नमाज़ पढ़ने को तैयार हो गए थे, लेकिन दुनियावी महबूबों का हुस्न देखकर हमारी नीयत बदल गई।
3
मछली ने ढील पाई है लुक़्मे पे शाद है सय्याद मुतमइन है कि काँटा निगल गई
मछली ढील पाकर चारे पर खुश हो रही है, जबकि शिकारी संतुष्ट है कि वह काँटा निगल चुकी है।
4
चमका तिरा जमाल जो महफ़िल में वक़्त-ए-शाम परवाना बे-क़रार हुआ शम्अ' जल गई
शाम के समय जब महफ़िल में आपका सौंदर्य चमका, तो परवाना बेचैन हो उठा और शमा जल उठी।
5
उक़्बा की बाज़-पुर्स का जाता रहा ख़याल दुनिया की लज़्ज़तों में तबीअ'त बहल गई
आख़िरत (परलोक) में होने वाले हिसाब-किताब का ख़्याल दिल से निकल गया, क्योंकि मन दुनिया के सुखों और ऐश-ओ-इशरत में उलझ कर बहल गया।
6
हसरत बहुत तरक़्क़ी-ए-दुख़्तर की थी उन्हें पर्दा जो उठ गया तो वो आख़िर निकल गई
उन्हें अपनी बेटी की तरक़्क़ी की बहुत चाहत थी, लेकिन जब पर्दा हटा तो वह आख़िरकार घर और दायरे से बाहर निकल गई।
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