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ग़ज़ल

आमद-ए-ख़त से हुआ है सर्द जो बाज़ार-ए-दोस्त

آمدِ خط سے ہوا ہے سرد جو بازارِ دوست
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 16 shers· radif: बहार-ए-गरमी-ए-बाज़ार-ए-दोस्त

यह ग़ज़ल महबूब की बदलती हुई सुंदरता पर मार्मिक टिप्पणी करती है, जहाँ चेहरे पर उगने वाले बारीक बालों ('ख़त') को एक बुझी हुई शमा के धुएँ की तरह दिखाया गया है, जो उसकी पहले की चमक को फीका कर देता है। शायर अपने नादान दिल को बेताब आरज़ूओं पर संयम रखने की सलाह देता है, क्योंकि महबूब के दीदार की ताब लाना हर किसी के बस की बात नहीं।

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1
आमद-ए-ख़त से हुआ है सर्द जो बाज़ार-ए-दोस्त दूद-ए-शम'-ए-कुश्ता था शायद ख़त-ए-रुख़्सार-ए-दोस्त
चेहरे पर बाल उगने से प्रियतम का आकर्षण जो ठंडा पड़ गया है, शायद गालों पर की वह रेखा बुझी हुई मोमबत्ती का धुआँ थी।
2
ऐ दिल-ए-ना-आक़िबत-अंदेश ज़ब्त-ए-शौक़ कर कौन ला सकता है ताब-ए-जल्वा-ए-दीदार-ए-दोस्त
हे अदूरदर्शी दिल, अपनी चाहत पर काबू पा। दोस्त के दीदार की चमक कौन बर्दाश्त कर सकता है?
3
ख़ाना-वीराँ-साज़ी-ए-हैरत तमाशा कीजिए सूरत-ए-नक़्श-ए-क़दम हूँ रफ़्ता-ए-रफ़्तार-ए-दोस्त
हैरत (आश्चर्य) द्वारा घर को वीरान करने का तमाशा देखिए। मैं महबूब की तेज़ चाल से पीछे छूट गया एक पदचिह्न हूँ।
4
इश्क़ में बेदाद-ए-रश्क-ए-ग़ैर ने मारा मुझे कुश्ता-ए-दुश्मन हूँ आख़िर गरचे था बीमार-ए-दोस्त
इश्क़ में मुझे प्रतिद्वंद्वी की ईर्ष्या की क्रूरता ने मार डाला। अंततः मैं दुश्मन (प्रतिद्वंद्वी) का मारा हुआ हूँ, भले ही मैं दोस्त (प्रेमी) के लिए बीमार था।
5
चश्म-ए-मा रौशन कि उस बेदर्द का दिल शाद है दीदा-ए-पुर-ख़ूँ हमारा साग़र-ए-सरशार-ए-दोस्त
मेरी आँखें इसलिए रोशन हैं क्योंकि उस बेदर्द का दिल खुश है। हमारी खून से भरी हुई आँखें ही दोस्त का लबालब भरा हुआ जाम हैं।
6
ग़ैर यूँ करता है मेरी पुर्सिश उस के हिज्र में बे-तकल्लुफ़ दोस्त हो जैसे कोई ग़म-ख़्वार-ए-दोस्त
मेरा प्रतिद्वंद्वी उसकी जुदाई में मेरा हाल ऐसे पूछता है, जैसे वह मेरा कोई घनिष्ठ मित्र या मेरे दुख का साथी हो।
7
ताकि मैं जानूँ कि है उस की रसाई वाँ तलक मुझ को देता है पयाम-ए-वादा-ए-दीदार-ए-दोस्त
वह मुझे दोस्त (प्रेमी) के दीदार (दर्शन) के वादे का संदेश देता है, ताकि मैं जान सकूँ कि उसकी पहुँच वहाँ तक है।
8
जब कि मैं करता हूँ अपना शिकवा-ए-ज़ोफ़-ए-दिमाग़ सर करे है वो हदीस-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबर-बार-ए-दोस्त
जब मैं अपने दिमाग़ की कमज़ोरी की शिकायत करता हूँ, तो वह महबूब की अंबर-खुशबूदार ज़ुल्फ़ों की बात छेड़ देती है।
9
चुपके चुपके मुझ को रोते देख पाता है अगर हँस के करता है बयान-ए-शोख़ी-ए-गुफ़्तार-ए-दोस्त
अगर वह मुझे चुपचाप रोते हुए देखता है, तो वह हँसकर महबूब की चुलबुली बातों का वर्णन करता है।
10
मेहरबानी-हा-ए-दुश्मन की शिकायत कीजिए ता बयाँ कीजे सिपास-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार-ए-दोस्त
दुश्मन की मेहरबानियों की शिकायत कीजिए, ताकि आप दोस्त (प्रिय) के दिए हुए दर्द के आनंद के लिए आभार व्यक्त कर सकें।
11
ये ग़ज़ल अपनी मुझे जी से पसंद आती है आप है रदीफ़-ए-शेर में 'ग़ालिब' ज़ि-बस तकरार-ए-दोस्त
मुझे अपनी यह ग़ज़ल अपने दिल से पसंद आती है, ग़ालिब, क्योंकि शेर की रदीफ़ में बस 'दोस्त' शब्द की ही पुनरावृत्ति है।
12
चश्म-ए-बंद-ए-ख़ल्क़ जुज़ तिमसाल-ए-ख़ुद-बीनी नहीं आइना है क़ालिब-ए-ख़िश्त-ए-दर-ओ-दीवार-ए-दोस्त
लोगों की बंद आँखें केवल अपनी ही तस्वीर (खुद-परस्ती) देखती हैं। दोस्त के दरवाज़े और दीवार की ईंटों का ढाँचा एक आइना है।
13
बर्क़-ए-ख़िर्मन-ज़ार गौहर है निगाह-ए-तेज़ याँ अश्क हो जाते हैं ख़ुश्क अज़-गरमी-ए-रफ़्तार-ए-दोस्त
यहाँ, तीखी निगाह एक मोती है और फसल के ढेर पर बिजली के समान है। प्रिय की चाल की गर्मी के कारण आँसू सूख जाते हैं।
14
है सवा नेज़े पे उस के क़ामत-ए-नौ-ख़ेज़ से आफ़्ताब-ए-सुब्ह-ए-महशर है गुल-ए-दस्तार-ए-दोस्त
उसके ताज़ा और ऊँचे क़द से सूरज सवा नेज़े पर है। क़यामत की सुबह का सूरज तो दोस्त की पगड़ी का फूल मात्र है।
15
ऐ अदू-ए-मस्लहत चंद ब-ज़ब्त अफ़्सुर्दा रह करदनी है जम्अ' ताब-ए-शोख़ी-ए-दीदार-ए-दोस्त
हे विवेक के दुश्मन, थोड़ी देर के लिए संयम से उदास रहो। प्रियतम के दीदार की शोख़ी सहने के लिए शक्ति इकट्ठा करनी है।
16
लग़्ज़िश-ए-मस्ताना ओ जोश-ए-तमाशा है 'असद' आतिश-ए-मय से बहार-ए-गरमी-ए-बाज़ार-ए-दोस्त
असद, यह मस्ताना लड़खड़ाहट और तमाशे का जोश है। शराब की आग से दोस्त के बाज़ार में गरमी की बहार आती है।
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