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ग़ज़ल

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

यह ग़ज़ल एक प्रतीक्षित सत्य (हक़ीक़त-ए-मुंतज़र) से विनती करती है कि वह कभी रूपक (मजाज़) के आवरण में प्रकट हो। कवयित्री कहती हैं कि उनकी भक्ति और तड़प (सज्दे) से भरे माथे पर, वह सत्य केवल रूपकों में नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से प्रकट होना चाहिए। यह एक आह्वान है कि जो चीज़ें पर्दे के पीछे छिपी हैं, उन्हें बाहर आकर जीवन में संगीत और स्पष्टता का संचार करना चाहिए।

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1
कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में
ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र, अगर तू किसी दिखावे या कल्पना के रूप में कभी नज़र आ जाए, तो यह जान ले कि मेरी विनती (नियाज़) में हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं।
2
ओ प्रतीक्षित सत्य, कभी तो रूपक के आवरण में प्रकट हो क्योंकि मेरी भक्ति भरे माथे पर हजारों सज्दे तड़प रहे हैं
हे प्रतीक्षित सत्य, कभी तो रूपक के आवरण से प्रकट हो जाओ। क्योंकि मेरे भक्तिपूर्ण माथे पर हजारों सज्दे (प्रणाम) करने को तड़प रहे हैं।
3
तरब-आशना-ए-ख़रोश हो तू नवा है महरम-ए-गोश हो वो सरोद क्या कि छुपा हुआ हो सुकूत-ए-पर्दा-ए-साज़ में
हे दुःख का साथी बनो, तू मेरे हृदय का अंतरंग है; वो सरोद क्या है जो साज के परदे की खामोशी में छिपा है।
4
उमंग को जोश दे, तू ध्वनि है कानों से परिचय बढ़ा वो साज किस काम का, जो चुपचाप पर्दे में छिपा पड़ा रहे
उमंग को जोश देने वाली, तुम ध्वनि हो जो कानों से परिचय बढ़ाती है। वह साज किस काम का, जो चुपचाप पर्दे में छिपा पड़ा रहे।
5
तू बचा बचा के न रख इसे तिरा आइना है वो आइना कि शिकस्ता हो तो अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आइना-साज़ में
तू इस तरह बचाकर न रख, ये तेरा आइना है। वो आइना कि टूटे तो, आइना बनाने वाले की नज़रों से ज़्यादा प्यारा है।
6
इस आईने को इतना संभालकर मत रख, इसे टूटने से मत बचा क्योंकि टूटा हुआ आईना ही आईना बनाने वाले की नजर में सबसे कीमती होता है
इस आईने को इतना संभालकर मत रखना, इसे टूटने से मत बचा, क्योंकि टूटे हुए आईने ही आईना बनाने वाले की नज़र में सबसे कीमती होते हैं।
7
दम-ए-तौफ़ किरमक-ए-शम्अ ने ये कहा कि वो असर-ए-कुहन न तिरी हिकायत-ए-सोज़ में न मिरी हदीस-ए-गुदाज़ में
दम-ए-तौफ़ और किरमक-ए-शम्अ ने यह कहा कि वह पुराना असर न तुम्हारी जलती कहानी में है और न मेरी बहती दास्तान में।
8
जब पतंगा लौ के चारों ओर घूम रहा था, तो उसने ये कहा वो पुरानी तपिश अब न तेरी जलन की कहानी में है, न मेरे पिघलने की दास्तान में
जब पतंगा लौ के चारों ओर घूम रहा था, तो उसने ये कहा कि वह पुरानी तपिश न तो तुम्हारी जलन की कहानी में है और न ही मेरी पिघलने की दास्तान में।
9
न कहीं जहाँ में अमाँ मिली जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली मिरे जुर्म-ए-ख़ाना-ख़राब को तिरे अफ़्व-ए-बंदा-नवाज़ में
ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ मुझे यह मिली हो, अगर मिली है, तो यह मेरे गुनाहगार और खराब कर्मों के लिए तुम्हारी दयालु बातें (फ़ज़ल) में ही मिली है।
10
इस दुनिया में मुझे कहीं भी शरण नहीं मिली, और अगर मिली तो कहाँ मिली? घर बर्बाद कारने वाले गुनाहों को माफ़ी का सहारा बस तेरी ईश्वरीय रहमत में मिला
इस दुनिया में मुझे कहीं भी कोई पनाह नहीं मिली, और अगर मिली भी तो कहाँ मिली? मेरे घर को बर्बाद करने वाले पापों के लिए माफ़ी का सहारा केवल तुम्हारी ईश्वरीय कृपा में ही प्राप्त हुआ।
11
न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ न वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ न वो ग़ज़नवी में तड़प रही न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ मैं
न इश्क़ में गर्मियाँ रहीं, न हुस्न में शोख़ियाँ; न ग़ज़नवी में तड़प रही, न ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में।
12
अब न वो प्रेम में वो गर्मजोशी बची, न सौंदर्य में पहले जैसी चमक अब न ग़ज़नवी में वो तड़प रही, न अयाज़ की ज़ुल्फ़ों में वो पहले जैसे फन्दे
अब न प्रेम में वह गर्मजोशी बची, न सौंदर्य में पहले जैसी चमक; अब न ग़ज़नवी में वह तड़प रही, न अयाज़ की ज़ुल्फ़ों में वह पहले जैसे फ़न्दे।
13
जो मैं सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा तिरा दिल तो है सनम-आश्ना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में
यदि मैं कभी सिर पर सजी हुई पगड़ी हुआ, तो ज़मीन से एक गीत निकलने लगेगा; लेकिन तेरा दिल, प्रिय, तो मुझे पहले से ही परिचित है, तू नमाज़ में क्या पाएगा।
14
जब मैंने सज्दा के लिये सर झुकाया तो ज़मीन से एक आवाज़ आने लगी तेरा दिल तो बुतों के प्रेम ही परिचित है, तुझे नमाज़ से क्या मिलेगा?
जब मैंने सज्दा के लिए सिर झुकाया, तो ज़मीन से एक आवाज़ आई, जिसने कहा, 'तुम्हारा दिल तो मूर्तियों के प्रेम से ही परिचित है; तुम्हें नमाज़ से क्या मिलेगा?'
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