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ग़ज़ल

सुना है हाल तिरे कुश्तगाँ बेचारों का

सुना है हाल तिरे कुश्तगाँ बेचारों का

यह ग़ज़ल एक दर्दनाक और गहन सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी है, जो 'आलम' नामक कवि की ओर से समाज के उपेक्षित और पीड़ित वर्गों की दुर्दशा का वर्णन करती है। इसमें कवि ने विरह, संघर्ष और जीवन की अस्थिरता के बीच, मानव जीवन के दुखद यथार्थ और सामाजिक अन्याय के दर्द को बड़ी ही मार्मिकता से प्रस्तुत किया है।

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1
सुना है हाल तिरे कुश्तगाँ बेचारों का हुआ न गोर गढ़ा उन सितम के मारों का
शायर कहता है कि उसने तुम्हारे असहाय रिश्तेदारों की हालत सुनी है, जो तुम्हारे अत्याचार के वारों से नहीं बच पाए।
2
हज़ार रंग खिले गुल चमन के हैं शाहिद कि रोज़गार के सर ख़ून है हज़ारों का
शायर कहता है कि गुलशन में हज़ार रंग खिले हैं, दोस्त, लेकिन रोज़गार के सिर पर हज़ारों का खून है।
3
मिला है ख़ाक में किस किस तरह का 'आलम याँ निकल के शहर से टक सैर कर मज़ारों का
प्रियतम, शहर और मक़बरों में घूमकर, धूल में किस तरह का 'जगत' मिल गया है?
4
'अरक़-फ़िशानी से उस ज़ुल्फ़ की हिरासाँ हूँ भला नहीं है बहुत टूटना भी तारों का
मैं नशीलेपन से उस ज़ुल्फ़ की रखवाली करने वाला हूँ; हे भगवान, तारों का बहुत टूटना भी अच्छा नहीं है।
5
'इलाज करते हैं सौदा-ए-इश्क़ का मेरे ख़लल-पज़ीर हुआ है दिमाग़ यारों का
मेरे दोस्तों, प्रेम के व्यापार का इलाज ऐसा है कि मेरे दिमाग में खराबी आ गई है।
6
तिरी ही ज़ुल्फ़ को महशर में हम दिखा देंगे जो कोई माँगेगा नामा सियाहकारों का
हम तुम्हारी ज़ुल्फ़ को क़यामत के दिन दिखा देंगे, जो कोई भी काले बालों वाले का नाम पूछेगा।
7
ख़राश-ए-सीना-ए-आशिक़ भी दिल को लग जाए 'अजब तरह का है फ़िरक़ा ये दिल-फ़िगारों का
आशिक़ के सीने की खरोंच भी दिल को लग जाए, अजब तरह का है फ़िरक़ा ये दिल-फ़िगारों का।
8
निगाह-ए-मस्त के मारे तिरी ख़राब हैं शोख़ न ठोर है न ठिकाना है होशियारों का
मस्ती भरे नज़रों के जादू से मेरी प्रिय, तुम्हारी सुंदरता बहुत मनमोहक है; होशियारों के लिए न कोई ठहराव है और न कोई ठिकाना।
9
करें हैं दा'वा ख़ुश-चश्मी-ए-आहुवान-ए-दश्त टक एक देखने चल मलक उन गँवारों का
शायर कहते हैं कि तुम युद्ध के मैदान की खूबसूरत आँखें हो, लेकिन मैं तुम्हें उन ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों को देखने चलने के लिए कह रहा हूँ, ऐ राजकुमार।
10
तड़प के मरने से दिल के कि मग़्फ़िरत हो उसे जहाँ में कुछ तो रहा नाम बे-क़रारों का
तड़प कर मरने को दिल की मग़्फ़िरत मानो। क्योंकि दुनिया में बेक़रार लोगों का नाम कुछ तो शेष रहता है।
11
तड़प के ख़िर्मन-ए-गुल पर कभी गिर ऐ बिजली जलाना क्या है मिरे आशियाँ के ख़ारों का
हे बिजली, तू कभी तड़प के फूल के प्याले पर क्यों गिरी? मेरे आशियाँ के काँटों में जलाना क्या है?
12
तुम्हें तो ज़ोहद-ओ-वरा पर बहुत है अपने ग़ुरूर ख़ुदा है शैख़-जी हम भी गुनाहगारों का
तुम्हें तो ज़ोहद और वैराग्य पर बहुत घमंड है। भगवान जानता है, शेख जी, हम भी गुनाहगार हैं।
13
उठे है गर्द की जा नाला गोर से इस की ग़ुबार-ए-'मीर' भी 'आशिक़ है ने सवारों का
नाला गोर से उठे है गर्द की जा नाला गोर से इस की ग़ुबार-ए-'मीर' भी 'आशिक़' है ने सवारों का।
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